आख़िर वज़न घटने के बाद कहां छू-मंतर हो जाती है शरीर की चर्बी?

स्कूल के दिनों में भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान के टीचर्स ने आपको भी पढ़ाया होगा कि ऊर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, हां उसका स्वरूप बदल जाता है. तो क्या आपने कभी ये सोचा है कि जब हम वज़न घटाते हैं तो उस चर्बी का क्या होता है? वो कहां चली जाती है?

वज़न घटाने की बात तो बहुत से लोग सोचते हैं, घटाते भी हैं लेकिन उस घटी हुई चर्बी का होता क्या है, ये एक बड़ा सवाल है. जिसका सही जवाब बहुत कम लोगों को पता है.

स्वास्थ्य की दुनिया में दख़ल रखने वाले क़रीब 150 से ज़्यादा लोगों से ये सवाल पूछा गया. ऑस्ट्रेलिया में सिडनी के यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ वेल्स के प्रोफ़ेसर एजे ब्राउन और रिसर्चर रूबेन मीरमान भी उन लोगों में शामिल थे जिनसे ये पूछा गया कि चर्बी आख़िर कहां चली जाती है.

इस सवाल के बहुत से जवाब मिले. कुछ तो बेहद मज़ेदार थे और कुछ बेहद चौंकाने वाले.

हालांकि 98 फ़ीसदी जवाब तो ग़लत ही मिले.

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आख़िर वज़न घटने के बाद कहां छू-मंतर हो जाती है शरीर की चर्बी?

स्कूल के दिनों में भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान के टीचर्स ने आपको भी पढ़ाया होगा कि ऊर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, हां उसका स्वरूप बदल जाता है. तो क्या आपने कभी ये सोचा है कि जब हम वज़न घटाते हैं तो उस चर्बी का क्या होता है? वो कहां चली जाती है?

वज़न घटाने की बात तो बहुत से लोग सोचते हैं, घटाते भी हैं लेकिन उस घटी हुई चर्बी का होता क्या है, ये एक बड़ा सवाल है. जिसका सही जवाब बहुत कम लोगों को पता है.

स्वास्थ्य की दुनिया में दख़ल रखने वाले क़रीब 150 से ज़्यादा लोगों से ये सवाल पूछा गया. ऑस्ट्रेलिया में सिडनी के यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ वेल्स के प्रोफ़ेसर एजे ब्राउन और रिसर्चर रूबेन मीरमान भी उन लोगों में शामिल थे जिनसे ये पूछा गया कि चर्बी आख़िर कहां चली जाती है.

इस सवाल के बहुत से जवाब मिले. कुछ तो बेहद मज़ेदार थे और कुछ बेहद चौंकाने वाले.

हालांकि 98 फ़ीसदी जवाब तो ग़लत ही मिले.

ज़्यादातर लोगों ने जवाब दिया कि जो चर्बी हम घटाते हैं वो ऊर्जा में बदल जाती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि इससे पदार्थ के संरक्षण के नियम का उल्लंघन होता है.

चर्बीइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

लेकिन असल में क्या होता है?

कुछ लोगों ने जवाब दिया कि चर्बी, मांसपेशियों में बदल जाती है. अब इस बात को मान लेना भी संभव नहीं है. वहीं कुछ लोगों ने कहा कि जो चर्बी हम घटाते हैं वो मल के रूप में हमारे शरीर से बाहर निकल जाती है.

पाचन क्रिया और वज़न घटाने को लेकर पहले से ही काफी भ्रम हैं और कुछ वैसा ही भ्रम इस बात को लेकर भी है कि जो चर्बी घटाई जाती है उसका क्या होता है.

लेकिन अब इसका जवाब दिया है प्रोफ़ेसर एंड्र्यू जे ब्राउन और रिसर्चर रूबेन मीरमान ने.

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में उनके जवाब प्रकाशित हुए हैं जिसके अनुसार नीचे लिखी ये बातें सामने आईं.

दरअसल, चर्बी, कार्बन डाइ ऑक्साइड और पानी में तब्दील हो जाती है. कार्बन डाई ऑक्साइड को हम सांस छोड़ने के दौरान शरीर से बाहर निकाल देते हैं. रही बात पानी की तो ये विभिन्न शारीरिक क्रियाओं से होता हुआ अंत में पेशाब के रूप में बाहर निकल जाता है.

बल्कि हम जो कुछ भी खाते हैं वो कार्बन डाइ ऑक्साइड रूप में हमारे फेफड़ों से बाहर फेंक दिया जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि हम जो भी कार्बोहाइड्रेट और वसा लेते हैं वो कार्बन डाइ ऑक्साइड और पानी में टूट जाता है. साथ ही अल्कोहल के रूप में भी.

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लंबी सांसें छोड़ना वज़न कम करने का तरीक़ा है?

यही प्रक्रिया प्रोटीन के साथ भी होती है. हालांकि कुछ चीज़ें यूरिया और दूसरे ठोस के रूप में भी बंट जाती हैं और बाद में मल के रूप में, पसीने के रूप में या यूरीन के रूप में शरीर से बाहर निकल जाती हैं.

सिर्फ़ फ़ाइबर्स ही ऐसे होते हैं जो हमारे पेट तक पहुंचते हैं और पाचन क्रिया के बाद बचा हुआ अवशेष मल के रूप में बाहर आता है.

अब अगर इस बात को सच माना जाए तो ये पता चलता है कि चर्बी का एक हिस्सा फेफड़ों से कार्बन डाइ ऑक्साइड के रूप में बाहर निकलता है. तो क्या अगर हम जल्दी-जल्दी और तेज़-तेज़ सांसें लें तो वज़न कम कर सकते हैं?

नहीं… प्रोफ़ेसर एंड्र्यू जे ब्राउन और रिसर्चर रूबेन मीरमान ऐसा नहीं करने की चेतावनी देते हैं. वो कहते हैं ऐसा करने से चक्कर आ सकते हैं और ऐसा भी हो सकता है कि वो शख़्स बेहोश हो जाए.

तो ऐसे में हेल्दी तरीक़े से वज़न कम करने का एकमात्र तरीक़ा सिर्फ़ यही है कि एक ओर डाइट में कैलोरी की मात्रा कम की जाए और इसके साथ-साथ फ़िजिकल एक्टिविटी पर ज़ोर दिया जाए.

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बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

बेटियों ने किया अंतिम संस्कार, मिली सज़ा

”जब हमने ही अपने पिता का ख़्याल रखा और मदद करने कोई नहीं आया तो अंतिम समय में हम क्यों नहीं अपने पिता को मुखाग्नि दे सकते हैं?”

ये सवाल करती हैं राजस्थान की रहने वालीं मीना रेगर, जिनके परिवार को पिता का अंतिम संस्कार बेटियों से कराने की सजा भुगतनी पड़ी.

मीना का मायका बूंदी में है और वो कोटा में अपने ससुराल में रहती हैं. उनके पिता दुर्गाशंकर की मृत्यु जुलाई में हुई थी.

जब मीना और उनकी तीन बहनों ने अपने पिता का अंतिम संस्कार करने का फ़ैसला किया तो उन्हें समाज से बेदखल होना पड़ा और उस मुश्किल घड़ी में उनके रिश्तेदार भी अकेला छोड़कर चले गए.

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बेटियों ने किया अंतिम संस्कार, मिली सज़ा

”जब हमने ही अपने पिता का ख़्याल रखा और मदद करने कोई नहीं आया तो अंतिम समय में हम क्यों नहीं अपने पिता को मुखाग्नि दे सकते हैं?”

ये सवाल करती हैं राजस्थान की रहने वालीं मीना रेगर, जिनके परिवार को पिता का अंतिम संस्कार बेटियों से कराने की सजा भुगतनी पड़ी.

मीना का मायका बूंदी में है और वो कोटा में अपने ससुराल में रहती हैं. उनके पिता दुर्गाशंकर की मृत्यु जुलाई में हुई थी.

जब मीना और उनकी तीन बहनों ने अपने पिता का अंतिम संस्कार करने का फ़ैसला किया तो उन्हें समाज से बेदखल होना पड़ा और उस मुश्किल घड़ी में उनके रिश्तेदार भी अकेला छोड़कर चले गए.

मीना बताती हैं, ”घर का खर्च पिता के कंधों पर था लेकिन 2012 में उन्हें लकवा मार गया. तब से घर की माली हालत ख़राब होने लगी.”

”ऐसे समय में मां और हम बहनों ने ही किसी तरह घर संभाला. तब किसी ने हमारी मदद नहीं की. किसी तरह बहनों की शादी हुई और ससुराल वालों से मदद मिली.”

”एक बार पिता ने कहा था कि हमारे मुश्किल समय में किसी ने हमारी मदद नहीं की. सब तुम बहनों ने संभाला है इसलिए मुझे मुखाग्नि भी तुम्हीं देना. शायद उन्हें पता भी था कि हम ये कर लेंगे. ”

राजस्थान, अंतिम संस्कारइमेज कॉपीरइटMEENA REGAR

लेकिन, मीना और उनकी बहनों को इस हिम्मत की कीमत चुकानी पड़ी और जिस दिन पिता का अंतिम संस्कार हुआ उसी दिन परिवार को समाज से बाहर निकाल दिया गया.

मीना बताती हैं, ”जब पिता की अर्थी तैयार की गई तो हम बहनें उन्हें उठाने के लिए आगे आईं. ये देखते ही सब हैरान रह गए और हमें टोकने लगे. तब हमने बताया कि पापा की यही इच्छा थी लेकिन हमारे परिवार वाले ही इसका विरोध करने लगे.”

”मेरे चाचा-ताऊ तक ने कहा कि छोरियां ऐसे खड़ी हो गई हैं. हम लोग मर गए क्या! इसके बाद पापा को कंधा देने से पहले ही वो लोग चले गए.”

समाज ने किया बाहर

लेकिन, बात यहीं तक ख़त्म नहीं हुई. जब चारों बहनें कंधे पर अपने पिता का मृत शरीर ले जा रही थीं तो पूरा गांव सकते में था. क्योंकि वहां वो हो रहा था जो कभी नहीं हुआ. फिर पंचायत ने इसका विरोध किया और उन्हें समाज से बाहर कर दिया.

मीना कहती हैं, ”हमारे यहां परंपरा है कि अंतिम संस्कार के बाद गांव में बने सामुदायिक भवन में नहाना होता है. लेकिन जब हम वहां पहुंचे तो सामुदायिक भवन पर ताला लगा हुआ था. हम समझ गए कि हमारे साथ क्या किया जा रहा है. हमें घर जाकर ही नहाना पड़ा.”

”ऐसे वक्त में लोग आपको सहारा देते हैं और मिलने आते हैं लेकिन हमें अकेला छोड़ दिया गया. परंपरा के मुताबिक जिस दिन घर में मौत होती है उस दिन खाना नहीं बनता. गांव के लोग खाना देते हैं. लेकिन, हमें किसी ने नहीं दिया. हमें रीत तोड़ते हुए घर पर ही खाना बनाना पड़ा.”

”एक तरफ़ सिर से पापा का साया हट गया और दूसरी तरफ समाज ने अलग कर दिया था. पर हम किसी भी स्थिति के लिए तैयार थे क्योंकि हमने कुछ गलत नहीं किया था.”

हालांकि, पंचायत की ये पाबंदियां ज़्यादा वक़्त नहीं चल पाई. पुलिस और मीडिया के दख़ल से वो लोग थोड़ा डर गए और पीछे हट गए.

राजस्थान, अंतिम संस्कारइमेज कॉपीरइटDDNEWS

समाज में ये परंपरा है कि माता-पिता का अंतिम संस्कार और उसके बाद की क्रियाएं बेटा ही पूरी करता है, जिनके बेटे नहीं होते उनमें ये कार्य नज़दीकी रिश्तेदारों का बेटा कर सकता है.

लेकिन, अब लोग इस परंपरा को तोड़ने भी लगे हैं. कुछ मामले ऐसे सामने आए हैं जिनमें बेटियों ने माता-पिता का अंतिम संस्कार किया है.

हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की दत्तक पुत्री नमिता राजकुमारी ने उन्हें मुखाग्नि दी थी. नमिता, राजकुमारी कौल और प्रोफ़ेसर बी एन कौल की बेटी हैं, उन्हें वाजपेयी ने गोद लिया था.

अटल बिहारी वाजपेयी के अंतिम संस्कार का टीवी पर लाइव प्रसारण भी हुआ था और एक बेटी को मुखाग्नि देते हुए हजारों लोगों ने देखा था.

फिर भी इस तरह के उदाहरण अभी बहुत कम हैं और समाज में इसकी स्वीकार्यता भी शुरुआती दौर में है.

लोग कहते तो हैं कि बेटियां भी उतनी ही प्यारी होती हैं जितना बेटा, लेकिन फिर भी बेटियों को अपने ही माता-पिता के अंतिम संस्कार का हक़ क्यों नहीं मिल पाता?

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बेटे को ही अधिकार क्यों

इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश कहते हैं, ”हमारे यहां कुछ परंपराओं के ज़रिए महिलाओं के उत्पीड़न के तरीके निकाले गए हैं. इनके ज़रिए उन्हें दोयम दर्जे पर रखा जाता है. राजस्वला (पीरियड्स) में मंदिर न जाने जैसे नियमों की तरह इसमें भी उन्हें अछूत महसूस कराया जाता है.”

”बेटे से अंतिम संस्कार कराना उसे माता-पिता पर ज़्यादा अधिकार देता है. ये मानसिकता है कि अगर बेटी से भी ये कराया जाएगा तो वो ज़्यादा अधिकार और ख़ासतौर पर संपत्ति का अधिकार न मांगने लगे. हालांकि, अब जो कानून है वो बेटियों के पक्ष में है और उन्हें ये सभी अधिकार देता हैं.”

स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि जिस धर्म को आधार बनाकर ये परंपराएं चल रही हैं वो ही इसे गलत मानता है. वेदों उपनिषदों में भी ऐसे किसी भेदभाव की बात नहीं की गई है बल्कि बराबरी का दर्ज़ा दिया गया है. बदलते समय के साथ लोगों को इन रुढ़ियों को छोड़ना चाहिए. बेटियों को अपने माता-पिता पर पूरा अधिकार मिलना चाहिए.

वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता कमला भसीन कहती हैं, ”किसी भी तरह के धार्मिक कामों से महिलाओं की दूरी बनाने का मतलब ही यही होता है कि उन्हें याद दिलाते रहो कि तुम निचले दर्ज़े के हो. पूरे इसांन तक नहीं हो. जैसा कि दलितों के साथ भी होता है. जबकि मेरा भाई होते हुए भी मैंने ख़ुद अपनी मां का अंतिम संस्कार किया था और हमें इसका कोई दैवीय प्रकोप नहीं झेलना पड़ा.”

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‘मेरे ब्वॉयफ्रेंड ने मुझे सबके सामने पीटा’

“कॉलेज के लॉन में वो सबके सामने मुझे पीट रहा था. वो नहीं देख रहा था कि उसका हाथ कहां पड़ रहा है, लेकिन लॉन में मौजूद कई लोग ये सब देख रहे थे. उसे मेरा किसी दूसरे लड़के से बात करना पसंद नहीं था, इसलिए वो नाराज़ था.”

“मैं उससे प्यार करती थी, इसलिए चुप रही. लेकिन फिर ये अक्सर होने लगा. उसे मेरे कपड़े पहनने के ढंग, दोस्तों के साथ उठने-बैठने से एतराज़ था. शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के पांच साल बाद मैं उससे अलग हो गई.”

ये बताते हुए आफरीन के आंसू छलक गए. ये कहानी सिर्फ आफ़रीन की नहीं बल्कि कई लड़कियों की है, जिनके ब्वॉयफ्रेंड ने उन्हें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया.

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‘मेरे ब्वॉयफ्रेंड ने मुझे सबके सामने पीटा’

“कॉलेज के लॉन में वो सबके सामने मुझे पीट रहा था. वो नहीं देख रहा था कि उसका हाथ कहां पड़ रहा है, लेकिन लॉन में मौजूद कई लोग ये सब देख रहे थे. उसे मेरा किसी दूसरे लड़के से बात करना पसंद नहीं था, इसलिए वो नाराज़ था.”

“मैं उससे प्यार करती थी, इसलिए चुप रही. लेकिन फिर ये अक्सर होने लगा. उसे मेरे कपड़े पहनने के ढंग, दोस्तों के साथ उठने-बैठने से एतराज़ था. शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के पांच साल बाद मैं उससे अलग हो गई.”

ये बताते हुए आफरीन के आंसू छलक गए. ये कहानी सिर्फ आफ़रीन की नहीं बल्कि कई लड़कियों की है, जिनके ब्वॉयफ्रेंड ने उन्हें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया.

अभिनेत्री एलीन मोरेनाइमेज कॉपीरइटINSTAGRAM
Image captionअभिनेत्री एलीन मोरेना

हाल ही में कोलंबिया की एक अभिनेत्री एलीन मोरेना ने इंस्टाग्राम पर वीडियो शेयर किया था. वीडियो में वो रो रही थीं और उनके नाक और होठों से खून बह रहा था. एलीना ने बताया कि उनका ये हाल उनके ब्वॉयफ्रेंड और अभिनेता ऐलेहेंद्रो गार्सिया ने किया है.

वीडियो में वो कह रही थीं, “मैंने उससे सिर्फ़ अपना पासपोर्ट मांगा था, लेकिन उसने मुझे बुरी तरह मारा. अब मैं क्या करूं, आप मेरी मदद करिए.”

उन्होंने ये वीडियो सोशल मीडिया पर इसलिए डाला ताकि दूसरी लड़कियां भी सामने आकर अपने साथ हो रहे इस तरह के व्यवहार पर बात करें.

उन्होंने इंस्टाग्राम पर #IDoDenounceMyAggressor नाम का हैशटैग चलाया, जिसका हज़ारों महिलाओं और पुरुषों ने समर्थन किया. कई लोगों ने भी अपनी तस्वीरें साझा कर बताया कि उनके पार्टनर ने भी उनके साथ हिंसा की.

लेकिन लोग हिंसा सहते क्यों हैं

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 15 से 71% महिलाओं के साथ उनके इंटिमेट पार्टनर ने कभी ना कभी शारीरिक या यौन हिंसा या फिर दोनों की होती है. कई बार पुरुष भी पीड़ित होते हैं, लेकिन महिलाओं के मुक़ाबले उनका प्रतिशत काफ़ी कम है.

लेकिन क्या वजह है कि पीड़ित लंबे वक्त तक ये सब सहते रहते हैं?

पीड़ित रिश्ते को बचाने के लिए ये सब सहते हैं. उन्हें उम्मीद होती है कि पार्टनर शायद अगली बार ये नहीं करेगा.

ज़्यादातर मामलों में लड़कियां अपने हिंसक रिश्ते के बारे में दोस्तों और घर वालों को नहीं बताती. उन्हें डर होता है कि दोस्त बाते बनाएंगे और घर वाले तो उन्हें ही ग़लत समझेंगे.

आफ़रीन कहती हैं, “जब कोई पति पत्नी को मारता है तो वो अपने ज़ख्म बाहर वालों से छिपाती है, लेकिन जब कोई बाहर वाला मारे तो जख़्म अपने ही घर वालों से छिपाने होते हैं. ये सबसे ज़्यादा मुश्किल होता है.”

“उससे झगड़े और मार-पीट के बाद जब मैं घर जाती थी तो रास्ते भर यही सोचती थी कि अपने बिखरे बाल, रो-रोकर सूज चुकी आंखें और थप्पड़ से लाल गालों को घर वालों से कैसे छिपाऊंगी. घर जाकर तबीयत ख़राब का बहाना बनाना पड़ता था. घर में खुलकर रो भी नहीं सकती थी, इसलिए बाथरूम में घुसकर सिसकियां लेती रहती थी.”

शोषणइमेज कॉपीरइटSCIENCE PHOTO LIBRARY

अमरीका में इस तरह के पीड़ितों के लिए एक नेशनल डेटिंग एब्यूज़ हेल्पलाइन है, जहां पीड़ित अपने ब्वॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड के ख़िलाफ़ शिकायत कर सकते हैं. यहां उन्हें भावनात्मक सपोर्ट भी मिलता है. हेल्पलाइन उन्हें ऐसा रिश्ता खत्म करने का तरीका भी बताती है. इस प्रोजेक्ट को अमरीकी सरकार से समर्थन मिला हुआ है.

भारत में ऐसी कोई ख़ास हेल्पलाइन तो नहीं है, लेकिन पीड़ित सामान्य तरीके से थाने में शिकायत कर सकते हैं.

रिश्ता खत्म करने के बाद

शोषणइमेज कॉपीरइटSCIENCE PHOTO LIBRARY

कई मामलों में रिश्ता खत्म होने के बाद भी एब्यूज़ ख़त्म नहीं होता. पीड़ित का एक्स ब्वॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड उसपर दोबारा रिलेशन में आने या सेक्शुअल फेवर का दबाव बनाता है. कई बार वो उसके घर वालों को सब कुछ बताने या निजी तस्वीरें साझा करने की धमकी दे देता है.

हाल ही में दिल्ली में एक मामला सामने आया, जहां ब्वॉयफ्रेंड के एब्यूज़िव बिहेवियर की वजह से गर्लफ्रेंड ने ब्रेक-अप कर लिया.

लेकिन उस लड़के ने लड़की को परेशान करना जारी रखा. वो उसके घर तक पहुंच गया. उसने उसे एक वीडियो भेजकर धमकी दी कि अगर उसने उससे शादी नहीं कि तो वो उसका भी ऐसा ही हाल करेगा.

उस वीडियो में लड़का किसी दूसरी लड़की को बुरी तरह मार रहा था.

लेकिन लड़की के घर वालों ने उसका साथ दिया, लड़की ने वो वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करके लड़के को बेनकाब कर दिया. जिसके बाद वो वीडियो वायरल हो गया और पुलिस ने लड़के को गिरफ़्तार कर लिया.

शोषणइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सोशल मीडिया के इस ज़माने में ब्लैकमेल के मामले काफी बढ़ गए हैं.

दिल्ली पुलिस के साइबर सलाहकार किसलय चौधरी अपनी खुद की एक साइबर हेल्पलाइन भी चलाते हैं.

वो बताते हैं कि कई लड़कियां हेल्पलाइन पर फोन कर मदद मांगती हैं. उनके पूर्व प्रेमी उनकी निजी तस्वीरों और वीडियो को सोशल मीडिया पर या घर के लोगों को भेज देने की धमकी देते हैं.

इसकी एवज में कई बार वो पैसे की मांग करते हैं तो कई बार सेक्शुअल फेवर की.

चौधरी कहते हैं कि लड़कियों को ऐसे मामलों में डरना नहीं चाहिए और पुलिस या साइबर सेल से संपर्क करना चाहिए.

(पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं.)

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दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा क्यों?

अफ़्रीका में इन ख़बरों का क्या असर होता है?

हाल के दक्षिण अफ़्रीकी दौरे पर हमारी यही जानने की कोशिश थी. विवादास्पद युवा नेता फुमलानी मफेका ने कहा, “जब हम भारत में अफ़्रीकियों पर हमलों के बारे में सुनते हैं तो निराशा होती है. हम सोचने लगते हैं कि क्या हमें यहां भारतीयों के ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई करनी चाहिए?”

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दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा क्यों?

अफ़्रीका में इन ख़बरों का क्या असर होता है?

हाल के दक्षिण अफ़्रीकी दौरे पर हमारी यही जानने की कोशिश थी. विवादास्पद युवा नेता फुमलानी मफेका ने कहा, “जब हम भारत में अफ़्रीकियों पर हमलों के बारे में सुनते हैं तो निराशा होती है. हम सोचने लगते हैं कि क्या हमें यहां भारतीयों के ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई करनी चाहिए?”

नस्ली भेद भाव
Image captionलेसेख़ो टेंडेली ने भारत जाने का इरादा रद कर दिया

25 वर्षीय छात्रा लेसेगो टेंडेली का दाख़िला दिल्ली यूनिवर्सिटी में हुआ. वो भारत आने की तैयारी कर चुकी थीं.

वो कहती हैं, “तब मेरी माँ ने कहा कि दिल्ली में अफ़्रीकियों पर हमले हो रहे हैं. एक अफ़्रीकी लड़की के साथ रेप की भी ख़बर है.”

आख़िर में लेसेगो ने ये फ़ैसला किया कि वो भारत नहीं जाएंगी.

नस्ली भेद भावइमेज कॉपीरइटगंधी संग्रहालय डरबन
Image captionमहात्मा गांधी 1890s में डरबन में प्रवासी भारतीयों को सम्बोधित करते हुए

ओयामा मुगडुसो एक कामयाब पेशवर हैं. वो एक बड़ी कंपनी के लिए काम करने एक साल के लिए मुंबई आये थे. उनका दावा है कि मुंबई में नस्ली भेदभाव के कारण वो नौ महीने में ही दक्षिण अफ़्रीका लौट गए.

उन्होंने मायूस होकर कहा, “मैं दुनिया के कई देशों में गया हूँ, लेकिन भारत से अधिक नस्ली भेदभाव कहीं नहीं पाया.”

अफ़्रीकियों का आरोप है कि यहां रहने वाले भारतीय मूल के लोग भी उनके ख़िलाफ़ नस्ली भेदभाव करते हैं.

नस्ली भेदभाव
Image captionदक्षिण अफ़्रीका के युवा नेता फुमलानी मफ़ेका

फुमलानी मफ़ेका जैसे नेताओं ने अपने देश में इसे एक सियासी मुद्दा बना दिया है. उनकी पहचान भारतीय विरोधी की बन गई है.

वो अपने बचाव में कहते हैं, “मेरे कई दोस्त भारतीय हैं. मैं ये नहीं कहता भरतीय मूल के लोगों को वापस भेज दिया जाए, लेकिन 150 साल बाद भी उन्होंने हमारी एक भाषा तक नहीं सीखी है”

इकॉनमिक फ़्रीडम फाइटर्स पार्टी के 37 वर्षीय विवादास्पद अध्यक्ष जूलियस मलेमा भारतीय मूल के लोगों पर “रेसिस्ट” होने का कई बार इल्ज़ाम लगा चुके हैं.

क्या रंगबेदी हैं भारतीय ?

भारतीय मूल के लोगों के ख़िलाफ़ उनके बयान सार्वजनिक हैं. इस साल की शुरुआत में उन्होंने अपने युवा समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा था, “ज़्यादातर भारतीय अफ़्रीकियों से नफ़रत करते हैं. वो नस्लवादी हैं.”

जूलियस मलेमा के इस बयान ने दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय मूल के लोगों को असहज कर दिया. अब तो भारतीय मूल के लोगों के ख़िलाफ़ भारत वापस जाओ के नारे भी सुनाई देने लगे हैं.

दक्षिण अफ़्रीका: सहारनपुर के भाइयों ने ऐसे मचाया बवाल

जैकब ज़ूमा के गले पड़ा ‘गुप्तागेट’

नस्ली भेदभावइमेज कॉपीरइटGANDHI MUSIEM
Image captionभारतीय मूल के लोगों को भी शुरू से ही नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ा था

जूलियस मलेमा समाज को विभाजित करने के इल्ज़ाम से घिरे नेता ज़रूर हैं, लेकिन युवाओं में उनकी लोकप्रियता दक्षिण अफ़्रीकी नेताओं के लिए एक चिंता की बात है.

बढ़ती बेरोज़गारी के कारण मलेमा जैसे नेता दक्षिण अफ़्रीका की राजनीती का एक अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं.

दक्षिण अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला एक इंद्रधनुष समाज बनाने पर ज़ोर देते थे. उन्होंने 1994 में दक्षिण अफ़्रीका की नस्ली भेदभाव करने वाली गोरी नस्ल की सरकार से आज़ादी के बाद एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जिसमें समाज के किसी वर्ग को नस्ली भेदभाव का सामना नहीं करना पड़े.

वो ख़ुद भी भेदभाव का शिकार हुए थे और 26 साल क़ैद रहे.

कौन हैं ये दक्षिण अफ़्रीका के गुप्ता जी?

नस्ली भेदभाव
Image captionआमतौर से हर समुदाय अपने मोहल्लों या इलाक़ों में रहना पसंद करता है

सरकारी आंकड़ों के अनुसार काले लोग देश की आबादी का 76 फ़ीसदी हैं जबकि गोरे महज नौ फ़ीसदी हैं और भारतीय मूल के लोग 2.5 फ़ीसदी हैं.

भारतीय मूल के लोगों को 158 साल पहले बंधुआ मज़दूर की तरह लाया गया था. ज़्यादातर लोगों को डर्बन शहर में बसाया गया.

उन्हें गन्ने के खेतों और रेलगाड़ी की पटरियां बिछाने के काम के लिए लाया गया था. ऐसा ब्रिटिश हुकूमत ने किया था, जिसका उस समय भारत और दक्षिण अफ़्रीका दोनों देशों पर राज था.

उस समय भारत से गए बंधुआ मज़दूरों को कुली कहा जाता था.

नस्ली भेद भाव
Image captionशुरू में भारतीय मूल के लोग डरबन शहर में आये. उनकी संख्या सब से अधिक यहीं है

यहां भारतीयों ने कड़ी मेहनत की और धीरे-धीरे समाज के ऊंचे पायदान पर चढ़ते गए.

आज की तारीख़ में दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय मूल के लोग आर्थिक और शैक्षणिक रूप से काफ़ी मजबूत हैं. भारतीय मूल के लोगों का कहना है कि स्थानीय उनकी कामयाबी से जलते हैं.

भारतीय भी स्वीकार करते हैं कि कालों से भेदभाव है. राजधानी प्रिटोरिया की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले भारतीय मूल के स्टूडेंट्स का कहना है कि अगर वो यहां की स्थानीय काली लड़की से शादी करते हैं तो घर में विरोध का सामना करना पड़ेगा.”

इन युवाओं का कहना है कि उनकी पीढ़ी में रंगभेद की मानसिकता धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है.

दक्षिण अफ़्रीका में ज़्यादातर लोगों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि भारत में अफ़्रीक़ियों के ख़िलाफ़ भेदभाव क्यों है? उनका कहना है कि वो तो भारत प्रेमी हैं. ऐसे में उनके लोगों पर हमले क्यों और उनके ख़िलाफ़ नस्ली भेद भाव क्यों?

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Article Source: http://EzineArticles.com/4400957